सामाजिक समस्याओं का समाधान: अनेकांतवाद 
July 27, 2019 • लेखक- डॉ. अरविन्द प्रेमचंद जैन 

प्रत्येक दर्शन की अपनी अपनी किला बंदी होती हैं जिससे वह दर्शन सुरसकहित रहता हैं। जैन दर्शन की किला बंदी अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांतवाद हैं, अनेकांतवाद का आशय हैं की सबकी भावनाओं का आदर करो, इसके विपरीत एकान्तवाद वह युध्य को ललकारता हैं। आज यदि सभी नेता, राजनेता समस्याओं का समाधान अनेकांतवाद से निकल सकते हैं, इसको मन, वचन और कर्म में उतारना होगा। 
सामाजिक समस्याओं का समाधान: अनेकांतवाद आज हाईटेक युग में व्यक्ति लोभ, हिंसा, परिग्रह, तनाव, विषमता, भ्रष्टाचार, दहेज, कन्या भ्रूण हत्या आदि शारीरिक पीड़ाओं और सामाजिक समस्याओं से ग्रसित है। इन तमाम समस्याओं के समाधान में अनेकान्त की महत्ती भूमिका है। अनेक अंत = अनेकांत जहां अंत = स्वरूप, स्वभाव या धर्म है, अनंता: धर्माः सामान्य विशेष पर्याय गुणा परमिति सिद्धो अनेकांतः जिसमें अनेक और अंत अर्थात् धर्म, विशेष, गुण और पर्याय पाये जाते हैं, उसे अनेकांत कहते हैं।
जन साधारण को जीव हिंसा से बचाने के लिए महावीर ने अहिंसा का उपदेश दिया और वैचारिक मतभेदों, उलझनों, झगड़ों आदि से बचने के लिए, शांति की स्थापना के लिए अनेकान्तवाद का सिद्धान्त दिया। अनेकांत भारत की अहिंसा का चरम उत्कर्ष है। इसे संसार जितना अधिक अपनाएगा, विश्वशान्ति उतनी ही जल्दी संभव है। वस्तु के यथार्थ स्वरूप को जानने की सही दृष्टि ही अनेकान्त है। चिंतन की अहिंसामयी प्रक्रिया का नाम अनेकांत है और चिंतन की अभिव्यक्ति की शैली या कथन स्याद्वाद हैं। अनेकांत एक वस्तु में परस्पर विरोधी और अविरोधी धर्मों का विधाता है वह वस्तु का नाना धर्मात्मक बताकर चरितार्थ हो जाता है। अनेकान्तवाद हमारी बुद्धि को वस्तु के समस्त धर्मों की ओर समग्र रूप से खींचता है।
अनेकांत दृष्टि का अर्थ है - प्रत्येक वस्तु में सामान्य रूप से, विशेष रूप से, प्रिय और अप्रिय की दृष्टि से नित्यत्व की अपेक्षा से, अनित्य की अपेक्षा से सद्रूप से और असद्रूप से अनंत धर्म होते हैं। समाज में विभिन्नता एवं साम्प्रदायिकता का विवाद भी अनेकांत से मिटाया जा सकता है। जब एकांगी दृष्टिकोण विवाद और आग्रह से मुक्त होंगे तभी भिन्नता में समन्वय के सूत्र परिलक्षित हो सकेगें।
समाज में एक ही प्रकार की जीवन प्रणाली, एक ही प्रकार के आचार-विचार की साधना न तो व्यवहार्य है और न संभव ही। वैचारिक सहिष्णुता के लिए अनेकान्तवाद के अवलम्बन की आवश्यकता है। सच्चा अनेकांतवादी किसी भी समाज-व्यक्ति के द्वेष नहीं करता। मानव की यह विचित्र मनोवृति हैं कि वह समझता है कि जो वह कहता है वही सत्य है और जो वह जानता है वही ज्ञान है क्योंकि इसके भीतर अहंकार छिपा हुआ है। अनेकान्तवाद से यही संकेत किया जाता है कि आचार के लिए और विचार के लिए सद्विचार, सहिष्णुता एवं सत्प्रवृति का सहयोग आवश्यक है। पर-पक्ष को सुनो उसकी बातों में भी सत्य समाया हुआ है। अनेकान्तवाद सिर्फ विचार नहीं है आचार-व्यवहार भी है जो अहिंसा, अपरिग्रह के रूप में विकसित हुआ है।
इस प्रकार अनेकान्तवाद जीवन की जटिल समस्याओं के समाधान का मूल मंत्र है। यह अहं तुष्टि सह अस्तित्वः वसुधैव कुटुम्बकम, जीओ और जीने दो की भावना का विकास करता है जिससे मानवीय गुणों की वृद्धि होती है जीवन का सम्पूर्ण विकास इसी से संभव है। 
आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी यानी सापेक्षता का सिद्धांत भी इस बात पर आधारित हैं। अनेकांतवाद और एकान्तवाद को बहुत ही सरल शब्दों में समझना हैं तो एक शब्द "ही "और दूसरा शब्द "भी", भी अनेकांतवाद का सूचक हैं और ही एकान्तवाद का सूचक हैं। इसका जीवंत उदाहरण हैं राम मंदिर ही बनेगा तो आजतक नहीं बन पाया और यदि भी का उपयोग करते तो शायद अभी तक बन जाता।  इसका उपयोग हर क्षेत्र में करना चाहिए। 

लेखक- डॉ. अरविन्द प्रेमचंद जैन